Read पत्ताखोर by Madhu Kankariyan Online

पत्ताखोर

सवातंतरयोततर भारतीय समाज में हमने जहाँ विकास और परगति की कई मंजिलें तय कि हैं, वहीं अनेक वयाधियाँ भी अरजित की हैं। अनेक सामाजिक कारणों से हम कुछ ऐसी बीमारियों से घिरे हैं जिनका कोई सिरा पकड़ में नहीं आता।युवाओं में बढती नशे और डरगस की लत एक ऐसी ही बिमारी है। एक तरफ समाज कि रग-रग में तनाव, घुटन, कुंठा और असंतोष वयाप रहा है, युवाओं को हर तरफ अंधी और अवरुदध गलियाँ नजर आ रही हैस्वातंत्र्योत्तर भारतीय समाज में हमने जहाँ विकास और प्रगति की कई मंजिलें तय कि हैं, वहीं अनेक व्याधियाँ भी अर्जित की हैं। अनेक सामाजिक कारणों से हम कुछ ऐसी बीमारियों से घिरे हैं जिनका कोई सिरा पकड़ में नहीं आता।युवाओं में बढती नशे और ड्रग्स की लत एक ऐसी ही बिमारी है। एक तरफ समाज कि रग-रग में तनाव, घुटन, कुंठा और असंतोष व्याप रहा है, युवाओं को हर तरफ अंधी और अवरुद्ध गलियाँ नजर आ रही हैं, लगातार खुलते बाज़ार की चकाचोंध से मध्य और निम्नमध्यवर्ग का युवा स्तब्ध है। नतीजा भटकाव और विकृति।नशे के लिए व्यक्ति खुद जिम्मेदार है, नशे के व्यापारी जिम्मेदार हैं या हमारी सामाजिक- आर्थिक वास्तविकताएँ, कहना कठिन है। इस उपन्यास में इन्हीं सवालों से दो चार हुआ गया है।...

Title : पत्ताखोर
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ISBN : 9788126722433
Format Type : Paperback
Number of Pages : 212 Pages
Status : Available For Download
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पत्ताखोर Reviews

  • विकास नैनवाल
    2018-10-13 19:13

    अभी मधु कंकारिया जी का उपन्यास पत्ताखोर पढ़ा। उपन्यास नशे कि आदत के चलते नायक की मानवता के न्यूनतम स्तर तक गिरने और फिर उठने की कहानी है। उपन्यास मुझे पसंद काफी आया।